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परशुराम जंयती

परशुराम जंयती हिन्दू धर्म के भगवान विष्णु के छठे अवतार की जयंती के रूप में मनाया जाता है। परशुराम जी की जयंती हर वर्ष वैशाख के महीने में शुक्ल पक्ष तृतीय के दौरान आता है। भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया और देवराज इन्द्र को प्रसन्न कर पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया। महर्षि की पत्नी रेणुका ने वैशाख शुक्ल तृतीय पक्ष में परशुराम को जन्म दिया था।

ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप अवतार तब लिया था। जब पृथ्वी पर बुराई हर तरफ फैली हुई थी। योद्धा वर्ग, हथियारों और शक्तियों के साथ, अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। भगवान परशुराम ने इन दुष्ट योद्धाओं को नष्ट करके ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाये रखा था।

हिंदू ग्रंथों में भगवान परशुराम को राम जामदग्नाय, राम भार्गव और वीरराम भी कहा जाता है। परशुराम की पूजा निओगी भूमिधिकारी ब्राह्मण, चितल्पन, दैवदन्या, मोहाल, त्यागी, अनावील और नंबुदीरी ब्राह्मण समुदायों के मूल पुरुष या संस्थापक के रूप में की जाती है।
अन्य सभी अवतारों के विपरीत हिंदू आस्था के अनुसार परशुराम अभी भी पृथ्वी पर रहते है। इसलिए, राम और कृष्ण के विपरीत परशुराम की पूजा नहीं की जाती है। दक्षिण भारत में, उडुपी के पास पजका के पवित्र स्थान पर, एक बड़ा मंदिर मौजूद है जो परशुराम का स्मरण करता है। भारत के पश्चिमी तट पर कई मंदिर हैं जो भगवान परशुराम को समर्पित हैं।

कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। परशुराम विष्णु अवतार कल्कि को भगवान शिव की तपस्या और दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे। यह पहली बार नहीं है कि भगवान विष्णु के 6 अवतार एक और अवतार से मिलेंगे। रामायण के अनुसार, परशुराम सीता और भगवान राम के विवाह समारोह में आए और भगवान विष्णु के 7 वें अवतार से मिले।

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परशुराम जंयती बारे में

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