मध्यमहेश्वर मंदिर

Short information

  • Location: Madhyamaheshwar Temple Trek, Uttarakhand 246469
  • Open and Close Timings: : 06.00 am to 07:00 pm.
  • April - Opening of the temple on Akshaya Tritiya(April/May)
  • November - Temple closes for winter after Diwali
  • Aarti Timings: 06:00 am and 06:30 pm
  • Nearest Airport : Jolly Grant airport of Dehradun at a distance of nearly 202 kilometres from Madhyamaheshwar .
  • Nearest Railway Station: Rishikesh railway station at a distance of nearly 180 kilometres from Madhyamaheshwar .
  • Primary deity: Lord Shiva.
  • Did you know: The Madhyamaheshwar Temple is one of the Panch Kedars and the fourth number of Panch Kedars. The temple was built by the Pandavas.

मध्यमहेश्वर या मैडमहेश्वर मंदिर गढ़वाल के मंसुना गांव, गढ़वाल हिमाहलय पर्वत, उत्तराखण्ड, भारत में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक हिन्दू मंदिर है। मध्यमहेश्वर मंदिर पंच केदारों में से एक है तथा पंच केदारों में इस चैथा नम्बर है। जो समुद्र तल से 3,497 मीटर (11,473 फीट) की ऊँचाई पर बना हुआ है। मध्य या बैल का पेट या नाभि (नाभि), शिव के दिव्य रूप माना जाता है, इस मंदिर में पूजा की जाती है। इस मंदिर की रजत मूर्तियों सर्दीयों में उखीमठ में स्थानांतरित कर दिया जाता है। मध्यमहेश्वर मंदिर पांडवों द्वारा बनाया गया था।

मध्यमहेश्वर मंदिर की वास्तुकला उत्तर भारतीय शैली में है। मंदिर पहाड की चोटी पर एक छोटे से काला मंदिर है जो शानदार चैखंबा चोटियों पर सीधे दिखता है। वर्तमान मंदिर में, काली पत्थर से बना एक नाभि के आकार का शिव-लिंगम, पवित्र स्थान में स्थित है। दो अन्य छोटे तीर्थ हैं, एक शिव व पार्वती के लिए और अन्य अर्धनारीश्वरा को समर्पित है, जो आधा-शिव आधा-पार्वती का रूप है। मुख्य मंदिर के दाहिनी ओर एक छोटा मन्दिर है जिसके गर्भगृह में संगमरमर से बनी देवी सरस्वती ( हिन्दू धर्म में ज्ञान की देवी कहा जाता है) की मूर्ति है।

गौधर और कालीमठ, मध्यमाहेश्वर के मार्ग पर दो महत्वपूर्ण स्थान हैं। कालीमाथ विशेष रूप से, बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों के लिए महत्व है यहां तीर्थ यात्री आध्यात्मिक शान्ति के लिए आते हैं और इसलिए इस स्थान को सिद्ध पीठ कहा जाता है। कालीमठ महाकाली और महालक्ष्मी देवी मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है, और भगवान शिव और उनके क्रूर रूपों में से एक भैरव के लिए प्रसिद्ध है। नवरात्र का समय इस स्थान पर विशेष महत्व का है जब बड़े बड़े भक्त इस स्थान पर आते हैं। गौधर, पैदल मार्ग के अंतिम में और मंदिर के पास, मध्यमहेश्वर गंगा और मार्कगंगा नदियों का संगम है और जो अद्भुत विचार प्रदान करता है।

एक कथा के अनुसार इस मंदिर को पंचकेदार इसलिए माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो अपने पाप से मुक्ति चाहते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवो को सलाह दी थी कि वे भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करे। इसलिए पांडवो भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए वाराणसी पहुंच गए परन्तु भगवान शंकर वाराणसी से चले गए और गुप्तकाशी में आकर छुप गए क्योकि भगवान शंकर पंाडवों से नाराज थे पांडवो अपने कुल का नाश किया था। जब पांडवो गुप्तकाशी पंहुचे तो फिर भगवान शंकर केदारनाथ पहुँच गए जहां भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर रखा था। पांडवो ने भगवान शंकर को खोज कर उनसे आर्शीवाद प्राप्त किया था। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मध्यमाहेश्वर में, भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन पांच स्थानों में श्री मध्यमहेश्वर को पंचकेदार कहा जाता है।

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मानचित्र में मध्यमहेश्वर मंदिर

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