विशालाक्षी मंदिर

Short information

  • Location: 6/29 Rani bhawani gali, Tripura Bhairwi Rd, Lahori Tola, Varanasi, Uttar Pradesh 221001
  • Timings: Open 05:00 am and Close 9:00 pm.
  • Best time to visit : Between August to March and During the festival Kajali Tij, Durga Puja and Navaratri
  • Nearest Railway Station : Varanasi Cantt. Railway Station at a distance of nearly 5.5 kilometres from Vishalakshi Devi Temple.
  • Nearest Airport : Lal Bahadur Shastri International Airport at a distance of nearly 24.6 kilometres from Vishalakshi Devi Temple.
  • Major festivals: Kajali Tij, Durga Puja and Navaratri
  • Did you know: Vishalakshi temple is one of the 51 Shaktipeeths of Mother. Vishalakshi temple is known for the Kajali Tij festival.

विशालाक्षी मंदिर या विशालाक्षी गौरी मंदिर हिन्दूओं का प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर देवी विशालाक्षी को समर्पित है। विशालाक्षी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है वह जिसकी बड़ी आंखें हैं। विशालाक्षी मंदिर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर गंगा नदी के तट पर स्थित मीरघाट( मणिकर्णिका घाट) पर है। वाराणसी का प्राचीन नाम काशी है। काशी प्राचीन भारत की सांस्कृतिक एवम पुरातत्व की धरोहर है। काशी या वाराणसी हिंदुओं की सात पवित्र पुरियों में से एक है। देवी पुराण में काशी के विशालाक्षी मंदिर का उल्लेख मिलता है।

विशालाक्षी मंदिर कजली तीज त्यौहार के लिए जाना जाता है, जो तीसरे दिन भद्रपद (अगस्त) के हिंदू महीने में पखवाड़े (दो सप्ताह का समय) के दौरान तीसरे दिन आयोजित किया गया था।

यह मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर में शक्ति को देवी विशालाक्षी के रूप पूजा जाता है और भैरव को संरक्षक व काल भैरव के रूप में पूजा जाता है। पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती ने उनके पिता दक्षेस्वर द्वारा किये यज्ञ कुण्ड में अपने प्राण त्याग दिये थे, तब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्माण चक्कर लगा रहे थे इसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें से सती की दायें कान की बाली इस स्थान पर गिरी थी। इसलिए इस जगह को ‘मणिकर्णिका घाट’ भी कहते हैं।

एक अन्य आख्यान के अनुसार माँ अन्नपूर्णा, जिनके आशीर्वाद से संसार के समस्त जीव भोजन प्राप्त करते हैं, वे ही ‘विशालाक्षी’ हैं। ‘स्कंद पुराण’ की कथा के अनुसार जब ऋषि व्यास को वाराणसी में कोई भी भोजन अर्पण नहीं कर रहा था, तब विशालाक्षी एक गृहिणी की भूमिका में प्रकट हुईं और ऋषि व्यास को भोजन दिया। विशालाक्षी की भूमिका बिलकुल अन्नपूर्णा के समान थी।

श्री विशालाक्षी मंदिर में सभी त्यौहार मनाये जाते है विशेष कर कजली तीज, दुर्गा पूजा व नवरात्र के त्यौहार पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन मंदिर को फूलो व लाईट से सजाया जाता है। मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं के दिल और दिमाग को शांति प्रदान करता है।

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